10 लाख रुपये के चेक बाउंस मामले में आरोपी बरी, अदालत ने ऋण देने की क्षमता पर उठाए सवाल, एडवोकेट अशोक अरोड़ा ने करी थी पेरवी
पाली, 4 जून। लगभग आठ वर्ष पुराने चर्चित 10 लाख रुपये के चेक बाउंस मामले में विशिष्ट न्यायिक मजिस्ट्रेट (एन.आई. एक्ट प्रकरण संख्या-2) पाली की अदालत ने आरोपी प्रमोद कुमार चौरसिया को आरोपों से बरी कर दिया है। न्यायालय की पीठासीन अधिकारी विनस चौधरी ने फैसला सुनाते हुए कहा कि परिवादी ऋण देने की अपनी आर्थिक क्षमता को विश्वसनीय रूप से सिद्ध नहीं कर पाया।
प्रकरण के अनुसार परिवादी गौरव मर्लेचा ने न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत कर आरोप लगाया था कि अक्टूबर 2017 में प्रमोद कुमार चौरसिया ने उससे 10 लाख रुपये उधार लिए थे। ऋण चुकाने के लिए आरोपी ने 5-5 लाख रुपये के दो चेक दिए, जो बैंक में प्रस्तुत करने पर “फंड्स इनसफिशिएंट” के कारण अनादृत हो गए। विधिक नोटिस के बावजूद भुगतान नहीं होने पर मामला न्यायालय पहुंचा।
सुनवाई के दौरान आरोपी ने सभी आरोपों का खंडन करते हुए कहा कि उसने परिवादी से कोई ऋण नहीं लिया था। बचाव पक्ष के अनुसार गौरव मर्लेचा मारवाड़ जंक्शन में वीसी (कमेटी) का संचालन करता था और उसी संबंध में सुरक्षा के तौर पर आरोपी के पांच हस्ताक्षरित खाली चेक लिए गए थे, जिन्हें बाद में वापस नहीं लौटाया गया।
आरोपी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अशोक अरोड़ा एवं उनके सहयोगी अधिवक्ता मोहम्मद शरीफ ने प्रभावी पैरवी की। बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि वर्ष 2017 में परिवादी की 10 लाख रुपये उधार देने की आर्थिक क्षमता नहीं थी। साथ ही आरोपी की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि उसे इतनी बड़ी राशि के ऋण की आवश्यकता पड़ती।
बचाव पक्ष ने दस्तावेजी साक्ष्यों के माध्यम से यह भी दर्शाया कि नोटबंदी के बाद वर्ष 2017 में परिवादी द्वारा 500-500 रुपये के नए नोटों में ऋण देने का दावा किया गया था। इसके अतिरिक्त उसी अवधि में अन्य व्यक्तियों को भी लाखों रुपये उधार देने के दावे और उनसे जुड़े चेक बाउंस मामलों का हवाला देते हुए परिवादी के दावों की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठाए गए।
न्यायालय ने अपने निर्णय में माना कि परिवादी 10 लाख रुपये उधार देने की अपनी आर्थिक क्षमता को संतोषजनक ढंग से साबित नहीं कर पाया। वहीं बचाव पक्ष द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों और जिरह से परिवादी की कहानी पर गंभीर संदेह उत्पन्न हुआ।
अदालत ने यह भी माना कि आरोपी ने परक्राम्य लिखत अधिनियम (एन.आई. एक्ट) के तहत परिवादी के पक्ष में उपलब्ध वैधानिक उपधारणा को सफलतापूर्वक खंडित कर दिया है। परिणामस्वरूप आरोपी प्रमोद कुमार चौरसिया को संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त घोषित किया गया।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह फैसला चेक बाउंस मामलों में परिवादी द्वारा ऋण देने की आर्थिक क्षमता सिद्ध करने की आवश्यकता को रेखांकित करने वाला महत्वपूर्ण निर्णय माना जा रहा है।