घरेलू हिंसा : महिलाओं के लिए बवाल या एक सवाल ?

घरेलू हिंसा : महिलाओं के लिए बवाल या एक सवाल ?
घर यानी एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था जहां कोई भी इंसान अपने जैविक रिश्तेदारों (माता-पिता, भाई-बहन पती-पत्नी, बच्चे आदि) के साथ एक छत के नीचे रहता है।
"घरेलू हिंसा" शब्द सुनते मात्र से ही एक प्रतिध्वनि दिमाग से आती है कि क्या ऐसी व्यवस्था में हिंसा की कोई जगह है या होनी चाहिए? हमारी मानव संस्कृति, जिसे विकसित होने में युग बीत गए, किस ओर जा रहीं हैं की, घरेलू हिंसा जैसा दानव घरों में पैर पसार रहा है।
जब हम घरेलू हिंसा की बात करते हैं तो इसका अभिप्राय, घर जैसी घरेलू ढांचे में किसी व्यक्ति में भय, अधीनता
आत्मविश्वास की कमी, आत्मशक्तिहीन स्वयं को कम आंकना आदि भावों को पैदा करने का व्यवस्थित तरीका है।
इस हिंसा के पीछे की मंशा एक व्यक्ति का दूसरे व्यक्ति पर अधिकार बनाएं रखने की हो सकती है।
इस पुरुष प्रधान समाज में घरेलू हिंसा की शिकार ज्यादातर महिलाएं ही होती है। इसका कोई एकल कारण नहीं . है , यह विभिन्न सामाजिक, व्यवहारिक, धार्मिक, सांस्कृतिक कारकों का एक संयोजन हो सकती है।
भारतीय सामाजिक परम्परा हमेशा से ही लिंग प्रधान रही है अर्थात लड़के के जन्म को हमेशा से ही उत्सव की तरह मनाया जाता है, तथा उसके पालन-पोषण की व्यवस्था कुछ इस प्रकार की होती है कि बचपन से ही उसमें यह भाव पैदा हो जातें हैं कि वह हर तरह से लड़कियों से प्रबल है और उसे यह अधिकार पुरुष रूप में जन्म लेने मात्र से ही प्राप्त है कि वह स्त्री को अपने से कम समझाने या बनाने का कोई मौका ना छोड़े चाहें उसे यह साबित करने में किसी भी प्रकार की हिंसा का सहारा लेना पड़े। घरेलू हिंसा पुरुषो कि इसी विकृत मानसिकता का परिणाम है।
बहुत सारे घर ऐसे हैं जहां बच्चियां भयावह वातावरण में रहती हैं क्योंकि वहां पिता ( जो स्वयं भी एक पुरुष है) , अपनी बच्ची को बोझ समझकर हर पल उसे व्यवहारिक व मानसिक तौर पर मारता है तथा उसे यह अहसास दिलाता हैं कि वह एक अवांछनीय वस्तु है जिसे आगे भी इस प्रकार की हिंसा व व्यवहार को झेलने का आदि होना है वह अपने पिता व भाई द्वारा किए जाने वाले दुर्व्यवहार को सहने की आदत बना लें तथा मुकबधिर हो जाएं क्योंकि आगे जाकर पतिव्रता नारी का धर्म निभाते हुए पति द्वारा कि जाने वाली हिंसा को बर्दाश्त करना है।
महिलाओं के खिलाफ घरेलू हिंसा के प्रकारों में शारीरिक, यौन, मौखिक और भावनात्मक शोषण से लेकर आर्थिक शोषण तक है।
घरेलू हिंसा के बढ़ते विकराल रूप को रोकने तथा पारिवारिक रिश्तों को बनाए रखने की एक कोशिश के रूप में केन्द्र सरकार द्वारा घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 लाया गया जिसके दायरे में ना सिर्फ विवाहित बल्कि अविवाहित महिलाएं भी शामिल हैं। घरेलू हिंसा अधिनियम के दायरे में आश्रय चिकित्सा सुविधाएं, सुरक्षा आदेश, मुआवजा आदेश आदि शामिल हैं। इस अधिनियम में घरेलू हिंसा की परिभाषा को भी विस्तार रूप दिया गया जिसके अनुसार ना सिर्फ वास्तविक दुर्व्यवहार व शारीरिक यातना ही नहीं बल्कि इसका खतरा भी घरेलू हिंसा की श्रेणी में आता है। पीड़ित महिलाएं वो सब हो सकती है जो अपराधी के साथ एक ही घर में रहती हैं चाहे उनका उससे कोई सम्बन्ध हो या ना हो।
घरेलू हिंसा का नाम आते ही ज्यादातर पति पत्नी के बीच होने वाले वैवाहत्तर क्लेश की तस्वीर सामने आती हैं जो कई कारणों से हो सकतें हैं। हमारे समाज ने एक ऐसा फ्रेम तैयार कर रखा जिसमें वह स्त्रियों की वहीं फोटो लगाना चाहता है जो उसे पसंद है या यूं कहें कि स्त्रियों को उतनी ही स्वतन्त्रता दें रखी हैं जितने से उसकी स्वतंत्रता
में खलल ना पड़े। जब कभी भी वह इस प्रेम से जरा बाहर निकलने की कोशिश करती है, उसे अपने ही साथी से हिंसा का शिकार होना पड़ता है। पुरुष जीवनसाथी का अपनी जीवनसंगिनी के प्रति दुर्व्यवहार व उत्पीड़न के कई कारण हो सकते हैं जैसे अपने पुरुषत्व को बल प्रयोग से दिखाना, अपने वर्चस्व को सिद्ध करना दहेज मालसा को शांत करने के लिए, पुत्र मोह के अधीन होना, पितृसत्ता को बनाए रखना संभोग की लालसा को जबरन पूरी करना. अपनी जीवनसंगिनी में डर पैदा करने के लिए उसके मनोबल को कम करने के लिए, जिससे वह किसी भी तरह से उससे आगे ना निकल पाए, उसमें आश्रित होने की भावना को पैदा करना ताकि वह बिना कोई आवाज उठाएं, उसके घर व बच्चों की जिम्मेदारी संभालती रहे।
बावजूद इसके कि इस अधिनियम को आए हुए इतने वर्ष हो चुके हैं फिर भी यह समस्या समस्या ना रहकर एक मुद्दा बन गई है, जिसका जिक्र अब हमे खुले मंच पर करने की आवश्यकता है।
भारतीय फिल्मकारों ने भी समय-समय पर इस विषय पर फिल्म बनाकर समाज के सामने इसकी भयावह तस्वीर को रखने की जिम्मेदारी पूरी कि है जैसे अगनीसाक्षी दरार सिक्रेट सुपरस्टार आदि ऐसी फिल्में है जिसमें नायिका को पुरुष जीवनसाथी द्वारा। शारीरिक तथा मानसिक यातना को झेलते हुए बताया गया है। हाल ही में प्रदर्शित फिल्म 'डार्लिंग' में भी पति को बार-बार मारपीट करते हुए तथा अपनी पत्नी में डर व भय को बनाए रखने हेतु उसके पशु तुल्य व्यवहार को दिखाकर फिल्मकार ने जताया है कि हम चाहे कितने ही आधुनिक और वैज्ञानिक तौर पर अपने को विकसित समझने का ढोल पिटते रहे परन्तु हमारे समाज की जड़ों में तो घरेलू हिंसा, महिला उत्पीडन, बलात्कार, पुत्रमोह, दहेज लालसा पितृसत्ता, जैसे जैसे कीड़े पड़े हुए हैं जो समाज रूपी वृक्ष को खोखला बना रहे हैं। +
घरों में बढ़ते हुए तनाव का प्रभाव बच्चों पर भी देखने को मिलता है आए दिन घरों में होने वाले का परिणाम ये होता है कि बच्चों के कोमल दिमाग पर पती-पत्नी के सम्बन्धों की एक पिक्चर बन जाती है जिसकी वजह से या तो उनका मानसिक विकास धीरे होगा या फिर उनकी भी मानसिकता इस प्रकार की हो जाएगी कि ती समझने लगेंगे कि वो भी अपनी बहन मां व पत्नी के साथ मार-पीट व दुव्र्यवहार करने के लिए स्वतंत्र है इसमें कुछ गलत नहीं है तथा लड़की यह मानसिकता बना लेती है कि पिता, भाई या पत्नी व पुत्र द्वारा किया गया ऐसा दुव्र्यवहार उनकी नियति है और वह एक अच्छी व संस्कारी नारी तब ही कहलायेगी जब वह यह सह चुपचाप सह लेंगी।
इस समस्या के बवाल में एक सवाल भी लिया है कि घरेलू हिंसा जी कि आज हर दूसरे तीसरे घर में व्याप्त है और जिसकी शिकार ना सिर्फ अनपढ़, रुम पढ़ी लिखी बल्कि शिक्षित उच्च स्तर कि महिलाएं भी किसी ना किसी रूप में पीड़ित है आखिर वह प्रतिक्रिया के रूप मे आवाज उठाकर अपने पिता पुत्र माई पत्ती को सजा दिलाकर कहा जाए? 'डारलिंग मूवी के एक डायलोग "जर कौन? शौहर (पति) की परम्यई । हमारे समाज में कम उम्र से ही लड़कियों का पालन पोषण इस ढंग से किया जाता है कि उसके जहन में यह बात बैठ जाए कि उसे इस समाज में सम्मान पूर्वक जीने के लिए पुरुष कि आवश्यकता है, फिर वो चाहे वो पिता हो आई हाँ, पति हाँ या पुनः हाँ वह अपने पति से अलग होकर अपना वजूद खो देगी। फिल्मकार ने शौहर की परछाई कहकर समाज के ताने-बाने पर व्यंग करता है कि चाहे पति मारे कुछ बुरा बर्ताव करें परन्तु उसका साथ होना जरूरी है। वह तुम्हे प्यार करता है तुम्हारी परवाह करता है इसलिए तुम्हारा शोषण करके अपनी ताकत दिखाता है। अब सवाल उठता है कि महिलाएं सहती क्यों है? क्योंकि उनके पास सोशल सपोर्ट नहीं होता है पती को छोड़ी हुई, तलाकशुदा महिलाओं को समाज में सम्मान जनक नजर से नहीं देखा जाता है, अपने वजूद को तलाशने में तथा अपने खोए आत्मविश्वास को लौटाने में, अपने सम्मान को बनाए रखने के लिए पति का घर छोड़ने के बाद पिता के घर में आश्रय नहीं मिलने पर अपने लिए आशियाना बनाने में अत्यधिक वक्त प्रयास व हिम्मत की जरूरत होती है जो अधिकांश महिलाएं नहीं जुटा पाती है।
कभी बच्चों की सही देखभाल, उनके भविष्य की सुरक्षा की चिता कभी माता पिता की इज्जत को बनाए रखने के लिए आर्थिक रूप से कमजोर होने की वजह से और कभी पति के पुरुषमय अहम को बरकरार रखने के लिए सहती आई है, सहती रहती है, क्या सहती रहेगी ? या 'डारलिंग मूवी की नायिका की तरह एक कदम आगे बढ़कर अपराधी को अंजाम तक पहुंचाकर अपने लिए एक नया आसमान टूटेगी। यह कहते हुए मुझे दिप्ती नवल का एक सिरियल याद आ रहा है थोड़ा सा आसमान जिसमे नायिकाएं किसी ना किसी रूप में इसी तरह की हिंसाओं का शिकार थीं तथा सारे विकृत बन्धनों को तोड़कर अपने लिए आसमान छूटने निकलती है। गुलज़ार साहब की सटीक पंक्तिया

हवा के दोष पे रख दूं या
हैं चन्द उड़ते हुए तिनकों का
मेरा आशियाना दें दो
मैं ओटू या बिछाऊ या
उसकी शाक पे रख दूं उसे दिन रात पहनूं मेरा हिस्से का जितना भी है थोड़ा सा आसमान……….
मेरा आसमान दें दो
डॉ चंचल कराड़िया
सहायक आचार्य
बाबा भगवान दास राजकीय महाविद्यालय चिमनपुरा शाहपुरा जयपुर