अब सवाल यह है कि हम प्रकृति को किस रूप में देख रहे हैं और उससे क्या हासिल करना चाहते हैं। यह समझने की बात है कि पर्यावरण को संशोधित नहीं किया जा सकता और न ही उस पर कोई टिप्पणी की जा सकती है, और न ही इस पर तर्क किया जा सकता है।
दरअसल, हमारी समायोजन न करने की चाह पर्यावरणीय समस्या नहीं बल्कि प्रकृति के साथ दुर्व्यवहार है। यदि तथाकथित समस्याओं की गहराई पर विचार किया जाए तो स्वाभाविक सवाल यह उठता है कि क्या पर्यावरण और प्रकृति से जुड़े हुए सारे परिवर्तन ‘समस्या’ हैं? क्या ज्वालामुखी की क्रिया हमेशा विध्वंसक ही होती है? क्या बाढ़ वास्तव में एक आपदा है? क्या प्रकृति को मनुष्य के मनोनुकूल व्यवहार करना चाहिए? क्या जलवायु की विविधता जलवायविक परिवर्तन है?