समाज में क्रान्तिकारी बदलाव के नायक .........महात्मा फूले

संवाददाता सुमेर सिंह राव

उदयपुरवाटी  l

आज महात्मा फुले जयंती पर विशेष

लेखक--मंगल चन्द सैनी पूर्व तहसीलदार

 

महाराष्ट्र के पुणे में एक सितारे का उदय हुआ जिसने प्रकाश पुंज बनकर शूद्रों व अति शूद्रों के जीवन में प्रकाश फैलाने का काम किया उस सितारे का नाम है ज्योतिराव फूले जिन्हें 1888 में मुंबई की एक विशाल जनसभा में महात्मा की उपाधि से नवाजा गया। आज महात्मा फूले किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं महाराष्ट्र में तो घर घर में उनकी पूजा की जाती है।
सबसे महत्वपूर्ण कार्य उन्होंने महाराष्ट्र में शूद्रों व दलितों को शिक्षित करने के लिये अनेक स्कूल खोली।। महिलाओं के लिये पृथक स्कूल खोली मजदूर वर्ग के लिये रात्रिकालीन स्कूल खोली। माता सावित्रीबाई जो उनकी अर्धांगिनी थी को उन्होंने स्वयं घर पर पढ़ा कर शिक्षिका बनाया जो भारत की प्रथम महिला शिक्षिका बनी। असल में शिक्षा की देवी कहलाने का हक सावित्रीबाई फूले का बनता है।
फूले दम्पत्ति के जीवनकाल को औसतन 150 वर्ष बीत चुके हैं उस समय शूद्रों की सोचनीय दशा सुनकर रुँह कांप जाती है। सार्वजनिक तालाबों जलस्त्रोतों पर जानवर को तो पानी पीने की आजादी थी किन्तु एक शूद्र को नहीं। महात्मा फूले ने अपने घर में बने कुए से पानी पीने की अनुमति दी। सुबह शाम घर से निकलने के बजाय दोपहर में ही घर से बाहर वह भी थूकने के लिये गले में हांडी डाल कर ही निकल सकते थे जिससे थूकना हो तो हांडी मे ही थूकें। कईयों के गले में घंटी बंधी होती थी जिससे पता चल जाये कि शूद्र आ रहा है। सरकारी कार्यालय हो कोर्ट कचहरी हो स्कूल हो या व्यापार हो कहीं भी दलितों की एंट्री नहीं थी। ऐसे में महात्मा फूले ने सामाजिक क्रान्ति का बिगुल बजाया। एक बार अपने ब्राह्मण दोस्त की बारात में वे जा रहे थे जब उन लोगों को पता चला कि यह तो शूद्र है तत्काल मारपीट कर उनको वहां से भगा दिया इस घटना ने उनको अंदर से हिला दिया।
उस समय विधवा महिलाओं के केश मुंडन कर उनको अपने हाल पर छोड़कर उनके जीवन को नरक बना दिया जाता था। हर कोई उनकी अस्मत से खेल लेता था। फूले ने महाराष्ट्र के नाइयों का संगठन बनाया और विधवा के केश मुंडन नहीं करने का संकल्प दिलवाया। विधवाओं की अवैध संतानों की डिलीवरी हेतु उन्होंने एक बाल हत्या प्रतिबंधक गृह खोला जहां विधवाएँ अपनी अवैध संतान को जन्म दे सकती थी उसका पालनपोषण भी वहीं किया जाता था। उन्हीं में एक ब्राह्मण विधवा की संतान को फूले दम्पत्ति ने गोद लेकर शिक्षित कर डॉक्टर बनाया और उसे अपनी जायदाद का उत्तराधिकारी घोषित किया। नासमझ बच्चों के विवाह करना आम बात थी महात्मा फूले ने ब्रिटिश सरकार से मिलकर बालविवाह निषेध कानून बनवाया। सती प्रथा चरम सीमा पर थी मृतक की विधवा को पति की चिता पर जबरन जला दिया जाता था। महात्मा फूले ने सती प्रथा के विरुद्ध कानून बनवाया। महाराष्ट्र में उस समय मजदूरों की दयनीय दशा थी उनके काम की कोई समयसीमा नहीं थी अल्प वेतन दिया जाता था छुट्टी नहीं करते थे। लोखंडे से मिलकर उन्होंने मिल मजदूर संघ बनाया काम के घंटे तय करवाये, साप्ताहिक अवकाश घोषित करवाया काम के दौरान मृत्यु होने या जख्मी होने पर मूआवजे का प्रावधान करवाया।
गरीबों असहायों व पीड़ितों को न्याय दिलवाने के लिये 1873 में सत्यशोधक समाज की स्थापना कर इतिहास में एक पन्ना जोड़ा।
फूले पुणे महानगर पालिका में प्रतिनिधि रहे उस दौरान जन समस्याओ को उन्होंने हल करवाया। वे कहा करते थे खेत का पानी खेत में, मेड़बंदी समतलीकरण खाद बीज हेतु सरकार से सस्ते ब्याज पर ऋण दिलवाये। महात्मा फूले सामाजिक कार्यों के साथ साथ लेखनी के भी धनी थे उनका साहित्य महाराष्ट्र सरकार अपने स्तर पर प्रकाशित कराती है विशेष रूप से"गुलाम गिरी "पुस्तक उल्लेखनीय है जिसके अध्ययन से उस समय की शूद्रों की दशा को महसूस किया जा सकता है।
कहाँ तक उल्लेख करें महात्मा फूले एक युगपुरुष थे उनके द्वारा किये गये समस्त कार्यों को इस लेख में समेटना असंभव है।
महात्मा फूले की जयन्ती पर विशेष
लेख
 के विचार लेखक स्वयं के हैं जिन पर सहमति होना आवश्यक नहीं है।

 

महाराष्ट्र के पुणे में एक सितारे का उदय हुआ जिसने प्रकाश पुंज बनकर शूद्रों व अति शूद्रों के जीवन में प्रकाश फैलाने का काम किया उस सितारे का नाम है ज्योतिराव फूले जिन्हें 1888 में मुंबई की एक विशाल जनसभा में महात्मा की उपाधि से नवाजा गया। आज महात्मा फूले किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं महाराष्ट्र में तो घर घर में उनकी पूजा की जाती है।
सबसे महत्वपूर्ण कार्य उन्होंने महाराष्ट्र में शूद्रों व दलितों को शिक्षित करने के लिये अनेक स्कूल खोली।। महिलाओं के लिये पृथक स्कूल खोली मजदूर वर्ग के लिये रात्रिकालीन स्कूल खोली। माता सावित्रीबाई जो उनकी अर्धांगिनी थी को उन्होंने स्वयं घर पर पढ़ा कर शिक्षिका बनाया जो भारत की प्रथम महिला शिक्षिका बनी। असल में शिक्षा की देवी कहलाने का हक सावित्रीबाई फूले का बनता है।
फूले दम्पत्ति के जीवनकाल को औसतन 150 वर्ष बीत चुके हैं उस समय शूद्रों की सोचनीय दशा सुनकर रुँह कांप जाती है। सार्वजनिक तालाबों जलस्त्रोतों पर जानवर को तो पानी पीने की आजादी थी किन्तु एक शूद्र को नहीं। महात्मा फूले ने अपने घर में बने कुए से पानी पीने की अनुमति दी। सुबह शाम घर से निकलने के बजाय दोपहर में ही घर से बाहर वह भी थूकने के लिये गले में हांडी डाल कर ही निकल सकते थे जिससे थूकना हो तो हांडी मे ही थूकें। कईयों के गले में घंटी बंधी होती थी जिससे पता चल जाये कि शूद्र आ रहा है। सरकारी कार्यालय हो कोर्ट कचहरी हो स्कूल हो या व्यापार हो कहीं भी दलितों की एंट्री नहीं थी। ऐसे में महात्मा फूले ने सामाजिक क्रान्ति का बिगुल बजाया। एक बार अपने ब्राह्मण दोस्त की बारात में वे जा रहे थे जब उन लोगों को पता चला कि यह तो शूद्र है तत्काल मारपीट कर उनको वहां से भगा दिया इस घटना ने उनको अंदर से हिला दिया।
उस समय विधवा महिलाओं के केश मुंडन कर उनको अपने हाल पर छोड़कर उनके जीवन को नरक बना दिया जाता था। हर कोई उनकी अस्मत से खेल लेता था। फूले ने महाराष्ट्र के नाइयों का संगठन बनाया और विधवा के केश मुंडन नहीं करने का संकल्प दिलवाया। विधवाओं की अवैध संतानों की डिलीवरी हेतु उन्होंने एक बाल हत्या प्रतिबंधक गृह खोला जहां विधवाएँ अपनी अवैध संतान को जन्म दे सकती थी उसका पालनपोषण भी वहीं किया जाता था। उन्हीं में एक ब्राह्मण विधवा की संतान को फूले दम्पत्ति ने गोद लेकर शिक्षित कर डॉक्टर बनाया और उसे अपनी जायदाद का उत्तराधिकारी घोषित किया। नासमझ बच्चों के विवाह करना आम बात थी महात्मा फूले ने ब्रिटिश सरकार से मिलकर बालविवाह निषेध कानून बनवाया। सती प्रथा चरम सीमा पर थी मृतक की विधवा को पति की चिता पर जबरन जला दिया जाता था। महात्मा फूले ने सती प्रथा के विरुद्ध कानून बनवाया। महाराष्ट्र में उस समय मजदूरों की दयनीय दशा थी उनके काम की कोई समयसीमा नहीं थी अल्प वेतन दिया जाता था छुट्टी नहीं करते थे। लोखंडे से मिलकर उन्होंने मिल मजदूर संघ बनाया काम के घंटे तय करवाये, साप्ताहिक अवकाश घोषित करवाया काम के दौरान मृत्यु होने या जख्मी होने पर मूआवजे का प्रावधान करवाया।
गरीबों असहायों व पीड़ितों को न्याय दिलवाने के लिये 1873 में सत्यशोधक समाज की स्थापना कर इतिहास में एक पन्ना जोड़ा।
फूले पुणे महानगर पालिका में प्रतिनिधि रहे उस दौरान जन समस्याओ को उन्होंने हल करवाया। वे कहा करते थे खेत का पानी खेत में, मेड़बंदी समतलीकरण खाद बीज हेतु सरकार से सस्ते ब्याज पर ऋण दिलवाये। महात्मा फूले सामाजिक कार्यों के साथ साथ लेखनी के भी धनी थे उनका साहित्य महाराष्ट्र सरकार अपने स्तर पर प्रकाशित कराती है विशेष रूप से"गुलाम गिरी "पुस्तक उल्लेखनीय है जिसके अध्ययन से उस समय की शूद्रों की दशा को महसूस किया जा सकता है।
कहाँ तक उल्लेख करें महात्मा फूले एक युगपुरुष थे उनके द्वारा किये गये समस्त कार्यों को इस लेख में समेटना असंभव है।