सम्यक आहार -- हम क्या खाते हैं, कितना खाते हैं, कब खाते हैं और किस मनोदशा से खाते हैं ? ध्यान करें.

सम्यक आहार -- हम क्या खाते हैं, कितना खाते हैं, कब खाते हैं और किस मनोदशा से खाते हैं? ध्यान करें.

आलेख: डॉ. एम एल परिहार,


तथागत बुद्ध ने मनुष्य की सुख शांति के लिए 'सम्यक' जीवन पर बहुत जोर दिया है. सम्यक यानी सही, ठीक (right). जैसे सम्यक वाणी, सम्यक दृष्टि, सम्यक आजीविका, सम्यक समाधि आदि. यह मध्यम मार्ग कहलाता है.
ध्यान कोई बंद आंखों से कमरे के कोने या गुफा में बैठ कर ही नहीं बल्कि दैनिक जीवन की हर गतिविधि में खुली आँखों से भी किया जाता है. ध्यान यानी जागरूकता, सजगता alertness /awareness /mindfulness.
भोजन तो सभी प्राणी करते हैं लेकिन इन बातों पर ध्यान करना और सजग रहना जरूरी है कि हम क्या खाते हैं,कब खाते हैं, कितना खाते हैं और किस भाव दशा में खाते हैं? ताज्जुब है कि मनुष्य के अलावा सभी प्राणी प्रकृति के इस नियम का पूरा पालन करते हैं, वे ध्यान करते हैं. बुद्ध कहते है कि मनुष्य जीवन दुर्लभ है और निरोग सबसे बड़ा सुख है. शरीर व मन से निरोगी.
हमें दिन में प्रकृति के नियम से ही आहार लेना चाहिए. भोजन की मात्रा भी उतनी हो जितनी शरीर को जरूरत हो. अक्सर लोग जो सामने दिख जाए व जरूरत से ज्यादा मात्रा में ठूंस ठूंस कर भोजन करते हैं. इससे कई तरह के रोग पैदा होते हैं. तथागत कहते हैं कि शरीर में जरूरत से ज्यादा मात्रा में डाली हुई हर चीज ज़हर होती हैं.
ऐसा कहा जाता है कि व्यक्ति जितनी मात्रा में पेट भर भोजन करता है. उसमें से स्वयं के लिए जरूरत तो आधी ही होती है बाकी डॉक्टर के लिए होती है.
दिन के अलग अलग प्रहर के अनुसार हर प्राणी का शरीर अलग अलग व्यवहार करता है. इसलिए प्रकृति के नियमानुसार समय पर ही भोजन लेना चाहिए. दरअसल भूख पेट को नहीं, मन को लगती है. मन काबू में नहीं होने व शरीर में पैदा होने वाली संवेदनाओं के प्रति सजग नहीं होने से स्वाद इंद्री हावी रहती है और बार-बार खाने की इच्छा होती है.
बात बहुत साधारण है लेकिन बहुत महत्वपूर्ण है कि भोजन करने के दौरान हमारा चित्त किस भाव में है. खुशी व आनंद के भाव से बनाया हुआ व इसी भाव से ग्रहण किया हुआ आहार शरीर में पॉजिटिव एनर्जी पैदा करता है जबकि क्रोध, घृणा, चिंता, उदासी की मनोदशा के साथ लिया भोजन शरीर में नेगेटिव एनर्जी पैदा करता है.
ध्यान,साधना, समाधि में सम्यक आहार बहुत जरूरी है. अधिक मात्रा में भोजन से भरे पेट, फिर आलस्य से भरे शरीर में ध्यान साधना कैसे होगी ? न पढाई , न श्रम होगा.
प्रकृति में सभी पशु पक्षी जरूरत से ज्यादा व गैरसमय भोजन ग्रहण नहीं करते हैं. यही कारण है कि पशु पक्षी अधिक भोजन के कारण पैदा होने वाले रोगों से मुक्त होते हैं.
प्रकृति में मनुष्य सबसे बुद्धिमान प्राणी है लेकिन भोजन के मामले में मन को वश में करने की साधना में वह दूसरे जीवों से बहुत पीछे हैं. विपस्सना ध्यान साधना एक श्रेष्ठ मार्ग है जिसके द्वारा व्यक्ति अपने मन को वश में करने की कला सीखता है. मन के विकारों को दूर कर निर्मल करने की विद्या सीखता है, दुखों से मुक्ति पाता है और यही जीवन जीने की कला है. सुख शांति के जीवन का मार्ग है .प्रेम करुणा व मैत्री का मार्ग है.
सबका मंगल हो .....सभी प्राणी सुखी हो
आलेख: डॉ. एम एल परिहार, जयपुर